مسئله نعمتها و به خصوص آنچه انسان با آن در ارتباط است، از بهتآورترين مسائل و شگفت انگيزترين برنامههاست. نه كسى قدرت برشمردن نعمتها را دارد و نه كسى قادر به درك حقيقت يك نعمت از نعمتهاى الهى است و نه كسى توان اداى شكر يك نعمت را هرچند به اندازه يك ارزن باشد، دارد!! در تمام نعمتها وقتى دقت شود، واضح و آشكار با چشم قلب، خدا را در آن نعمت مىتوان ديد و منظور قرآن هم از بيان نعمتها، كسب معرفت و اداى شكر نسبت به آن جناب است؛ زيرا هرچه هست از اوست و سرايى خالى از دلبر نيست، به قول فيض آن مست جام عشق: [TABLE="class: cms_table"] [TR] [TD]اى فداى عشق تو ايمان ما[/TD] [TD][/TD] [TD]وى هلاك عفو تو عصيان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD][/TD] [TD][/TD] [TD][/TD] [/TR] [TR] [TD]گر كنى ايمان ما را تربيت[/TD] [TD][/TD] [TD]عشق گردد عاقبت ايمان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]آتش خوف تو آب ديدهها[/TD] [TD][/TD] [TD]زآب حكمت آتش طغيان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]اى به ما آثار صنع تو پديد[/TD] [TD][/TD] [TD]وى تو پنهان در درون جان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]اى تو هم آغاز و هم انجام خلق[/TD] [TD][/TD] [TD]وى تو هم پيدا و هم پنهان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]گوشها را سمع و چشمان را بصر[/TD] [TD][/TD] [TD]در دل و در جان ما ايمان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD][/TD] [TD][/TD] [TD][/TD] [/TR] [TR] [TD]اى جمالت كعبه ارباب شوق[/TD] [TD][/TD] [TD]وى كمالت قبله نقصان ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]عاجزيم از شكر نعمتهاى تو[/TD] [TD][/TD] [TD]عجز ما بين بگذر از كفران ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]اى بدى از ما و نيكويى زتو[/TD] [TD][/TD] [TD]آن خود كن پرده پوش آن ما[/TD] [/TR] [TR] [TD]فيض را از فيض خود سيراب كن[/TD] [TD][/TD] [TD]اى بهشت و كوثر و رضوان ما «1»[/TD] [/TR] [/TABLE]